मंगलवार, 3 जून 2014

एक सबक दूसरों के काम आ रहा...


सालों पहले जब हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षाओं में आज की तरह अच्छे प्रतिशत नहीं आते थे उसी दौर में जतिन ने इंटरमीडिएट की परीक्षा में सर्वाधिक अंक लाकर स्कूल ही नहीं वरन अपने जिले में भी टॉप किया। जतिन मेधावी छात्र था लेकिन इंटरमीडिएट के बाद आगे की पढ़ाई को लेकर उलझ गया। जतिन के माता-पिता कम पढ़े लिखे थे, अतः उनसे आर्थिक मदद के अलावा आगे के भविष्य को लेकर जतिन को कोई मार्गदर्शन नहीं मिला। जतिन के कुछ रिश्तेदारों ने उसे ग्रेजुएशन करने को कहा तो किसी ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का सुझाव दिया। 

जतिन दोनो लोगों की बातों में इस तरह उलझा कि उसने कला वर्ग से स्नातक में दाखिला ले लिया जबकि वह अब तक विज्ञान का छात्र था। पढ़ाई के प्रथम वर्ष में ही उसका मन न लगा। 
अगले साल उसने फिर से प्रवेश परीक्षा दी और इस बार वह विज्ञान वर्ग में दाखिला लिया। स्नातक पूरा हो जाने के बाद भी उसका लक्ष्य स्पष्ट नहीं हुआ कि उसको अपने जीवन में क्या करना है।जो कोई उसे जैसी राय दे देता वह उसी विषय में दाखिला ले लेता। 

इस तरह उसके पास डिग्रियों की भरमार हो गयी जबकि नौकरी अभी भी उससे कोसों दूर थी। वह रोजगार के चक्कर में दिन भर यहां से वहां चप्पलें घिसता औऱ किसी भी नौकरी की जल्द कोई आसार न दिखने पर वह मानसिक तनाव से गुजरने लगा। उसे लोगों का कहा अब बिल्कुल पसंद नहीं आता औऱ चिड़चिड़ेपन ने उसे घेर लिया।

इस सब चीजों से निजात पाने के लिए उसने एक कोचिंग संस्था में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया जिससे उसकी आजीविका चलनी शुरू हो गयी। धीरे-धीरे उसने उन्नति की और आज खुद का एक बड़ा कोचिंग संस्थान चलाता है। जिसमें सैकड़ों हाईस्कूल औऱ इंटरमीडिएट के बच्चे कोचिंग पढ़ने आते हैं।

बोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट आ गए हैं और हर साल जतिन की तरह ही लाखों बच्चे यह नहीं समझ पाते की उन्हें आगे करना क्या है। वह अपनी रुचि ना तो समझ पाते हैं ना ही जाहिर कर पाते हैं और लोगों की कही बातों में उलझ कर कुछ भी करने के चक्कर में किसी भी विषय में दाखिला ले लेते हैं। आगे उस विषय में मन ना लगने पर उन्हें उसे मजबूरन छोड़ना पड़ता है। इससे पैसे के साथ-साथ उनका कीमती वक्त भी बर्बाद होता है। इससे वे बच्चा मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं।

चूंकि जतिन इस दौर से गुजर चुका है। भटकते-भटकते ही सही लेकिन आज उसके पास उसकी खुद की बड़ी कोचिंग संस्था है। वह इंटरमीडिएट के बाद आगे की पढ़ाई को लेकर होने वाली उलझन को अच्छी तरह समझता है। इन उलझनों से तमाम बच्चों को बाहर निकालने के वह हर साल अपने कोचिंग संस्था में बाहर से कुछ कॅरियर काउंसलर को बुलाता है। जिनकी सहायता से बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए विषय चुनने में काफी सहायता मिलती है। इस साल भी सैकड़ों बच्चे उसके कोचिंग संस्था में जाकर कॅरियर काउंसलर से मार्गदर्शन लेकर अपने भविष्य की नींव खुद रखने के लिए तैयार हैं। जिससे जतिन को इस बात की खुशी मिलती है कि बच्चा दूसरों की बातों में न आकर अपना निर्णय खुद ले रहा है।

अगर हम अपनी गलतियों से सीखें और आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर मार्गदर्शन प्रदान कर उन्हें गर्त में जाने से बचाएं तो ऐसे लाखों बच्चों का भविष्य खराब होने से बचाया जा सकता है, जो मेधावी तो होते हैं लेकिन यह नहीं समझ पाते कि किस रास्ते पर चलकर जीवन में आगे बढ़ा जा सकता है।

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